नवरात्रि का नौवां दिन, जिसे नवमी भी कहते हैं, माँ दुर्गा की नौ शक्तियों में से नौवीं शक्ति, माँ सिद्धिदात्री को समर्पित है। यह दिन नवरात्रि के उत्सव का आख़िरी दिन होता है और इस दिन माँ की पूजा-अर्चना के साथ-साथ कन्या पूजन और हवन का विशेष महत्व होता है। आइए जानते हैं नवमी के दिन की जाने वाली पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, मंत्र और कन्या पूजन से जुड़ी सभी ज़रूरी बातें।
माँ सिद्धिदात्री: नवमी की देवी
माँ सिद्धिदात्री सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करने वाली देवी हैं। इनकी पूजा से भक्तों को ज्ञान, बल और मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसा माना जाता है कि इनकी कृपा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। कमल पर विराजमान माँ सिद्धिदात्री के एक हाथ में चक्र, दूसरे में गदा, तीसरे में शंख और चौथे में कमल का फूल होता है।
नवमी पूजा का शुभ मुहूर्त
नवमी की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त जानना बहुत ज़रूरी है ताकि आप सही समय पर माँ की आराधना कर सकें।
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ब्रह्म मुहूर्त: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
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पूजा का शुभ समय: इस साल नवमी की पूजा के लिए सबसे अच्छा समय [तिथि और समय यहाँ डालें, उदाहरण के लिए: सुबह 06:20 से 08:00 बजे तक] रहेगा।
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हवन का मुहूर्त: हवन के लिए भी शुभ मुहूर्त का ध्यान रखें, जो कि [तिथि और समय यहाँ डालें, उदाहरण के लिए: सुबह 09:30 से 11:00 बजे तक] हो सकता है।
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नवमी की पूजा विधि
नवमी के दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा पूरे विधि-विधान से की जाती है।
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संकल्प: सबसे पहले हाथ में जल, फूल और चावल लेकर पूजा का संकल्प लें।
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माँ सिद्धिदात्री का ध्यान: माँ का ध्यान करते हुए उनका आह्वान करें।
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पूजा सामग्री: माँ को कमल का फूल, नारियल, ऋतु फल, मिष्ठान, नैवेद्य और खीर का भोग लगाएँ। माँ को बैंगनी रंग के वस्त्र और चूड़ियाँ अर्पित करना शुभ माना जाता है।
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दीप प्रज्ज्वलित करें: घी का दीपक जलाएँ और धूपबत्ती करें।
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मंत्र जाप: माँ सिद्धिदात्री के मंत्रों का जाप करें।
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माँ सिद्धिदात्री का ध्यान मंत्र:
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“सिद्ध गन्धर्व यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥”
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“या देवी सर्वभूतेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”
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बीज मंत्र: “ॐ ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धिदात्र्यै नमः।”
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दुर्गा सप्तशती का पाठ: इस दिन दुर्गा सप्तशती के नवें अध्याय का पाठ करना विशेष फलदायी होता है।
हवन पूजन विधि
नवमी के दिन हवन के बिना नवरात्रि की पूजा अधूरी मानी जाती है।
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हवन कुंड तैयार करें: एक साफ़-सुथरे हवन कुंड में आम की लकड़ियाँ और गोबर के कंडे रखें।
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अग्नि प्रज्ज्वलित करें: अग्नि को प्रज्ज्वलित करें और उसमें घी की आहुति दें।
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मंत्रों के साथ आहुति: सभी देवी-देवताओं और माँ दुर्गा के नाम से स्वाहा बोलकर आहुतियाँ दें। नवग्रहों के लिए भी आहुति दी जाती है।
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पूर्ण आहुति: हवन के अंत में पूर्ण आहुति दें, जिसमें नारियल, सुपारी, पान, लौंग, इलायची, और कुछ दक्षिणा के साथ हवन कुंड में डालें।
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आरती: हवन के बाद माँ दुर्गा की आरती करें।
कन्या पूजन विधि
कन्या पूजन को कंजक पूजन भी कहा जाता है और यह नवमी के दिन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
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कन्याओं को आमंत्रित करें: 9 छोटी कन्याओं और एक बालक (जिन्हें बटुक भैरव का रूप माना जाता है) को घर पर आमंत्रित करें। उनकी उम्र 2 से 10 साल के बीच होनी चाहिए।
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चरण धोएँ: कन्याओं के घर आने पर उनके पैर धोएँ और उन्हें आसन पर बिठाएँ।
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तिलक लगाएँ: उन्हें कुमकुम और चावल का तिलक लगाएँ।
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भोग लगाएँ: उन्हें हलवा, पूड़ी, और चने का प्रसाद खिलाएँ। कुछ लोग खीर, पूरी और आलू की सब्ज़ी भी बनाते हैं।
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उपहार दें: भोजन के बाद उन्हें दक्षिणा और छोटे-मोटे उपहार जैसे रुमाल, शिक्षा सामग्री या फल आदि भेंट करें।
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आशीर्वाद लें: कन्याओं के चरण छूकर आशीर्वाद लें।
माँ सिद्धिदात्री की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में भगवान शिव ने तपस्या करके माँ सिद्धिदात्री से सभी सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। इनकी कृपा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हो गया था, जिससे वे ‘अर्धनारीश्वर’ कहलाए। तभी से माँ सिद्धिदात्री की पूजा करने से भक्तों को आठ सिद्धियाँ (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) प्राप्त होती हैं।
आरती
हवन और कन्या पूजन के बाद माँ दुर्गा की आरती ज़रूर करें।
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