बिहार विधानसभा चुनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर अपनी पुरानी आदत चली – विपक्ष को कोसा और खुद को ‘विकास पुरुष’ बताने लगे। वैशाली की एक रैली में मोदी ने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) पर तंज कसते हुए कहा, “बिहार में लालू-राबड़ी राज में ‘रंगालराज’ था, जहां सिर्फ रंग-रोगन और भ्रष्टाचार का खेल चलता था। हमने तो विकास की लहर ला दी!” लेकिन सवाल यह है – विकास कहाँ है, पीएम साहब? नाम बदलने के सिवा तो कुछ हाथ ही नहीं लगाया बिहार को!
मोदी का यह बयान पहले चरण की वोटिंग के ठीक बाद आया, जब 121 सीटों पर 3.75 करोड़ मतदाताओं ने भागीदारी की। RJD सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने तुरंत पलटवार किया: “रंगालराज? मोदी जी खुद ‘नामालवा राज’ चला रहे हैं। हाईवे, एयरपोर्ट, रेलवे – सबके नाम बदल दिए, लेकिन बिहार की सड़कें, स्कूल, अस्पताल आज भी वही जर्जर हैं। 10 सालों में नामों का जादू तो चला, विकास का क्या?”
नाम बदलने का ‘विकास मॉडल’: सिर्फ दिखावा, कोई सुधार नहीं
मोदी सरकार के 11 सालों का हिसाब लगाइए तो विकास के नाम पर सबसे बड़ा ‘उपलब्धि’ यही निकलता है – नाम बदलना। बिहार में ही देखिए:
– मुजफ्फरपुर एयरपोर्ट को ‘भगवानपुर’ नाम दिया, लेकिन उड़ानें आज भी सीमित, और किसानों की फसलें सड़ रही हैं।
– बेगूसराय को चंद्रगुप्त मौर्य नगर* बनाने का ऐलान, लेकिन इलाके में बेरोजगारी 40% से ऊपर, युवा पलायन कर रहे हैं।
– केंद्र की योजनाओं का तो हाल ही देख लीजिए: *मनरेगा* को *महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार* कहा, लेकिन बिहार में मजदूरों को 100 दिन का काम भी नहीं मिला। *स्वच्छ भारत* लॉन्च किया, लेकिन बिहार के 70% गांवों में शौचालय तो बने, पानी की कमी से बेकार पड़े हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह ‘नामकरण संस्कृति’ सिर्फ वोट बैंक की राजनीति है। इकोनॉमिक सर्वे 2025 के मुताबिक, बिहार का GDP ग्रोथ रेट 2014 से 2024 तक महज 4.5% रहा, जबकि मोदी के ‘विकास’ दावों के बावजूद प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से 30% कम है। बेरोजगारी दर 18% पर काबू पाने के नाम पर *’आत्मनिर्भर भारत’* का नारा दिया, लेकिन बिहार के 1 करोड़ युवाओं में से आधे बिना नौकरी के घूम रहे हैं।
बिहार की जनता का फैसला: नाम या विकास?
पहले चरण की वोटिंग में विकास ही मुख्य मुद्दा था – बेरोजगारी, महंगाई, बाढ़। लेकिन मोदी का ‘रंगालराज’ तंज ने इसे और गरमा दिया। क्या बिहार की जनता नाम बदलने वाले ‘विकास’ को स्वीकार करेगी? विशेषज्ञ कहते हैं, नहीं। 2025 चुनाव में महागठबंधन को फायदा हो सकता है, क्योंकि लोग थक चुके हैं – नामों के खेल से, न कि असली बदलाव से।

