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6 Mar 2026, Fri

क्या आपको बचपन की वो कविता याद है? “बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी…”

यकीनन, जैसे ही ये पंक्तियां कानों में गूंजती हैं, शरीर में एक अलग ही ऊर्जा दौड़ जाती है। आज उसी वीरांगना, भारत की बेटी और झांसी की शान रानी लक्ष्मीबाई की जयंती (Rani Lakshmibai Jayanti) है। आज का दिन सिर्फ उन्हें याद करने का नहीं, बल्कि यह महसूस करने का है कि कैसे एक साधारण लड़की ने देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

आइये, आज उनकी जिंदगी के पन्नों को थोड़ा पलटते हैं।

मनु से ‘रानी’ बनने का सफर
वाराणसी के घाटों पर एक छोटी सी बच्ची खेला करती थी, जिसका नाम था मणिकर्णिका। प्यार से लोग उन्हें ‘मनु’ या ‘छबीली’ कहते थे। जिस उम्र में बच्चियां गुड़ियों से खेलती थीं, मनु को घुड़सवारी और तलवारबाजी का शौक था। शायद नियति को पता था कि आगे चलकर इस बच्ची को गुड़ियों से नहीं, बल्कि अंग्रेजों की तोपों से खेलना है।

उनकी शादी झांसी के राजा गंगाधर राव से हुई और वो बन गईं झांसी की रानी लक्ष्मीबाई। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन वक्त को कुछ और ही मंजूर था। राजा की मृत्यु और अपने नवजात बेटे को खोने के बाद रानी अकेली पड़ गईं।

अंग्रेजों की चाल और रानी की दहाड़
उस समय अंग्रेज भारत को दीमक की तरह खोखला कर रहे थे। उनकी नजर झांसी पर थी। उन्होंने सोचा कि राजा नहीं रहे, तो अब झांसी को हड़पना आसान होगा। लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि उनका पाला किसी कमजोर महिला से नहीं, बल्कि एक शेरनी से पड़ा है।

जब अंग्रेजों ने झांसी को अपने कब्जे में लेना चाहा, तो महल के अंदर से एक ही आवाज आई- “मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी!” यह सिर्फ एक वाक्य नहीं था, यह 1857 की क्रांति (1857 Revolt) का एक ऐसा शंखनाद था, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी।

पीठ पर बेटा और हाथ में तलवार
इतिहास में ऐसी तस्वीरें बहुत कम देखने को मिलती हैं। जरा सोचिए उस मंजर के बारे में – चारों तरफ दुश्मन, गोलियों की बौछार और बीच में घोड़े पर सवार रानी लक्ष्मीबाई। उन्होंने अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को अपनी पीठ पर कपड़े से कसकर बांधा और युद्ध के मैदान में कूद पड़ीं।

ग्वालियर के किले के पास जब वो अंग्रेजों से घिर गईं, तब भी उन्होंने हार नहीं मानी। कहते हैं कि रानी ने तब तक तलवार चलाई जब तक उनकी आखिरी सांस बाकी थी। 18 जून 1858 को वो वीरगति को प्राप्त हुईं, लेकिन मरते दम तक उन्होंने अपनी पवित्र देह को अंग्रेजों के हाथ नहीं लगने दिया। उस वक्त उनकी उम्र महज 29 साल थी।

सुभद्रा कुमारी चौहान की वो अमर कविता
रानी लक्ष्मीबाई की कहानी अधूरी है अगर हम कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान (Subhadra Kumari Chauhan) का जिक्र न करें। उनकी लिखी कविता ने रानी की वीरता को घर-घर पहुंचा दिया। यह कविता सिर्फ शब्दों का मेल नहीं है, बल्कि इसमें उस दौर का जोश और एक वीरांगना का बलिदान छुपा है। आज भी स्कूलों में जब बच्चे इसे गाते हैं, तो लगता है मानो रानी लक्ष्मीबाई हमारे बीच ही कहीं मौजूद हैं।

आज के दौर में उनकी सीख
रानी लक्ष्मीबाई का जीवन हमें सिखाता है कि मुसीबत चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अगर हौसला बुलंद है तो आप अकेले भी पूरी सेना पर भारी पड़ सकते हैं। आज उनकी जयंती पर उन्हें शत-शत नमन।


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