भारत के पड़ोसी देशों में भू-राजनीतिक उठापटक कोई नई बात नहीं है। हालांकि, हाल ही में नेपाल में सामने आए घटनाक्रम कई सवाल खड़े करते हैं, खासकर जब हम इसे बांग्लादेश के पिछले राजनीतिक संकट से जोड़कर देखते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि नेपाल में वही “तख्तापलट की पटकथा” दोहराई जा रही है जो बांग्लादेश में शेख हसीना और केपी ओली के समय देखी गई थी। लेकिन इस बार, भारत के इस महत्वपूर्ण पड़ोसी में पर्दे के पीछे कौन खेल खेल रहा है?
नेपाल की राजनीति में अस्थिरता का लंबा इतिहास रहा है, लेकिन वर्तमान स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। प्रधानमंत्रियों का बार-बार बदलना, राजनीतिक दलों के बीच आंतरिक कलह और विदेशी शक्तियों की कथित दखलअंदाजी ने देश को गहरे संकट में धकेल दिया है। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ अंदरूनी कलह है या कोई बाहरी ताकत भारत के पड़ोस में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है?
बांग्लादेश में शेख हसीना और केपी ओली के कार्यकाल के दौरान भी हमने ऐसी ही अस्थिरता और सत्ता परिवर्तन के खेल देखे थे, जहां बाहरी हस्तक्षेप की अटकलें लगाई जाती थीं। अब नेपाल में भी कुछ ऐसी ही परिस्थितियां बनती दिख रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह भारत के लिए एक गंभीर चुनौती है, क्योंकि उसके पड़ोस में बढ़ता असंतोष और अस्थिरता सीधे तौर पर उसकी सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव को प्रभावित कर सकती है।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि भारत के पड़ोस में हो रहे ये घटनाक्रम केवल आंतरिक मामले नहीं हैं। वे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और भू-राजनीतिक शतरंज के खेल का हिस्सा हैं। ऐसे में भारत को सतर्क रहने और अपने पड़ोसियों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखने की आवश्यकता है ताकि किसी भी बाहरी प्रभाव को रोका जा सके और क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे।

