वाशिंगटन, 20 सितंबर 2025: ट्रम्प प्रशासन ने H-1B वीजा प्रणाली में व्यापक बदलावों की घोषणा की है, जो टेक्नोलॉजी सेक्टर और विशेषकर भारतीय पेशेवरों के लिए महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है। 19 सितंबर 2025 को जारी रिपोर्टों के अनुसार, प्रशासन ने H-1B वीजा आवेदनों के लिए $100,000 का अतिरिक्त शुल्क लागू करने और प्रीवेलिंग वेज (मूल वेतन) स्तरों को बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है। ये बदलाव नए और मौजूदा वीजा धारकों दोनों पर लागू हो सकते हैं, जिससे टेक इंडस्ट्री और भारतीय आईटी कंपनियों पर भारी असर पड़ने की संभावना है।
1. $100,000 का नया शुल्क:
ट्रम्प प्रशासन ने H-1B वीजा आवेदनों के साथ $100,000 का भारी-भरकम शुल्क जोड़ने की घोषणा की है। यह शुल्क नए आवेदनों के साथ-साथ संभवतः रिन्यूअल्स और एक्सटेंशन्स पर भी लागू होगा। हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि यह शुल्क पूरी तरह गैर-वापसी योग्य होगा या कुछ परिस्थितियों में छूट संभव होगी। इसके अलावा, यह भी अस्पष्ट है कि क्या यह शुल्क हर रिन्यूअल पर दोबारा देना होगा। इस कदम का उद्देश्य H-1B प्रोग्राम के दुरुपयोग को रोकना और अमेरिकी श्रमिकों के हितों को प्राथमिकता देना बताया जा रहा है।
प्रभाव:
• छोटी और मध्यम आकार की कंपनियों के लिए H-1B कर्मचारियों को रखना महंगा हो सकता है, जिससे वे अमेरिकी कर्मचारियों की भर्ती को प्राथमिकता दे सकती हैं।
• बड़े टेक दिग्गज जैसे अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल, जो H-1B वीजा पर भारी निर्भरता रखते हैं, इस शुल्क के कारण लागत में वृद्धि का सामना करेंगे।
• उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि इस नीति का टेक इंडस्ट्री से तीव्र विरोध हो सकता है, क्योंकि यह नवाचार और प्रतिभा आकर्षण को प्रभावित कर सकता है।
2. प्रीवेलिंग वेज में वृद्धि:
प्रशासन ने श्रम विभाग (DOL) को निर्देश दिया है कि H-1B कर्मचारियों के लिए प्रीवेलिंग वेज स्तरों को संशोधित किया जाए। इसका लक्ष्य विदेशी कर्मचारियों को कम वेतन पर नियुक्त कर अमेरिकी श्रमिकों की तुलना में प्रतिस्पर्धी लाभ लेने की प्रथा को रोकना है। कुछ रिपोर्टों में अनुमान लगाया गया है कि न्यूनतम वेतन स्तर $150,000 तक हो सकता है, हालांकि यह आंकड़ा अभी आधिकारिक रूप से पुष्ट नहीं हुआ है। यह वृद्धि विभिन्न नौकरियों और स्किल लेवल के आधार पर अलग-अलग लागू हो सकती है।
प्रभाव:
• उच्च वेतन आवश्यकताओं के कारण कंपनियां केवल अति-उच्च कुशल कर्मचारियों को प्राथमिकता दे सकती हैं, जिससे मध्यम-कुशल कर्मचारियों की मांग कम हो सकती है।
• भारतीय आईटी पेशेवरों, जो H-1B वीजा पर निर्भर हैं, को नौकरी के अवसरों में कमी का सामना करना पड़ सकता है।
3. नए और मौजूदा वीजा धारकों पर प्रभाव:
रिपोर्ट्स के अनुसार, यह नीति केवल नए H-1B आवेदनों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि मौजूदा वीजा धारकों के रिन्यूअल्स और एक्सटेंशन्स पर भी प्रभाव डालेगी। विशेष रूप से उन आवेदनों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा जो विदेशों में प्रोसेस किए जाते हैं। इंट्रा-कंपनी ट्रांसफर्स पर प्रभाव अलग हो सकता है, लेकिन इसकी स्पष्टता अभी बाकी है।
4. कानूनी और प्रक्रियात्मक चुनौतियां:
इन बदलावों को लागू करने के लिए प्रशासन को एडमिनिस्ट्रेटिव प्रोसीजर्स एक्ट (APA) के तहत नोटिस-एंड-कमेंट रूलमेकिंग प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि $100,000 जैसे भारी शुल्क और वेतन वृद्धि जैसे कदमों को अदालतों में चुनौती दी जा सकती है। इसके अलावा, कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस तरह के शुल्क और नीतिगत बदलाव कांग्रेस के अधिकार क्षेत्र में आ सकते हैं, जिससे इसकी वैधता पर सवाल उठ सकते हैं।
5. भारतीय पेशेवरों और टेक इंडस्ट्री पर प्रभाव:
भारत H-1B वीजा का सबसे बड़ा लाभार्थी देश है, जहां 2024 में 71% वीजा भारतीय पेशेवरों को जारी किए गए। इस नीति से भारतीय आईटी कंपनियां जैसे इन्फोसिस, टीसीएस और विप्रो सबसे अधिक प्रभावित होंगी। इन कंपनियों को भर्ती लागत में भारी वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है, जिसके परिणामस्वरूप वे वैकल्पिक बाजारों या वीजा मार्गों की तलाश कर सकती हैं।
• टेक सेक्टर: उच्च लागत के कारण स्टार्टअप्स और छोटी टेक फर्म्स की भर्ती प्रक्रिया धीमी हो सकती है, जिससे नवाचार पर असर पड़ सकता है।
• भारतीय कर्मचारी: जिन भारतीय पेशेवरों का ग्रीन कार्ड प्रोसेस लंबित है, उन्हें रिन्यूअल्स के लिए अतिरिक्त शुल्क के कारण अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है।
6. उद्योग और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया:
टेक उद्योग ने इस नीति का कड़ा विरोध किया है। टेस्ला के सीईओ एलन मस्क जैसे कुछ उद्योग नेता, जो स्वयं H-1B वीजा धारक रह चुके हैं, का कहना है कि यह नीति अमेरिका की प्रतिस्पर्धात्मकता को कमजोर कर सकती है। दूसरी ओर, ट्रम्प प्रशासन के समर्थक इसे अमेरिकी श्रमिकों के हित में एक कदम मानते हैं, जो H-1B प्रोग्राम के दुरुपयोग को रोकने में मदद करेगा।
निष्कर्ष:
ट्रम्प प्रशासन का यह कदम H-1B वीजा प्रणाली को पूरी तरह बदल सकता है। भारतीय पेशेवरों और टेक इंडस्ट्री पर इसका प्रभाव गहरा होगा, और कानूनी चुनौतियों के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक परिणाम भी सामने आ सकते हैं। इस नीति के कार्यान्वयन और इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर सभी की नजरें टिकी हैं।

