क्या आपने कभी सोचा है कि दिवाली साल में दो बार क्यों आती है? एक हमारी जानी-मानी लक्ष्मी पूजा वाली दिवाली और दूसरी… देव दिवाली! जी हाँ, कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाई जाने वाली ये देव दिवाली, देवताओं की दिवाली है। लेकिन क्यों? इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प पौराणिक कथा छिपी है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत और भगवान शिव के पराक्रम की कहानी बताती है।
चलिए, आपको ले चलते हैं एक ऐसे समय में जब धरती और स्वर्ग दोनों पर एक भयंकर राक्षस का आतंक छाया हुआ था।
त्रिपुरासुर: तीन शहरों का महाबली राक्षस
बहुत समय पहले की बात है, एक असुर था त्रिपुरासुर। वो कोई साधारण राक्षस नहीं था, बल्कि उसने मायावी शक्तियों से तीन ऐसे विशाल और अद्भुत शहर बनाए थे, जिन्हें “त्रिपुर” कहा जाता था। ये शहर सोने, चांदी और लोहे के बने थे और इस तरह से डिज़ाइन किए गए थे कि इन्हें कोई भी देवता या मनुष्य भेद नहीं सकता था। त्रिपुरासुर इतना शक्तिशाली हो गया था कि उसने स्वर्गलोक पर भी कब्ज़ा कर लिया था और देवताओं को अपना दास बना लिया था।
देवता परेशान थे, त्राहि-त्राहि कर रहे थे। कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। जब सारे उपाय विफल हो गए, तो सभी देवता भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के पास मदद मांगने पहुंचे। सबने मिलकर भगवान शिव से प्रार्थना की, क्योंकि वे ही एकमात्र ऐसे देव थे जो त्रिपुरासुर का अंत कर सकते थे।
महादेव का विकराल रूप और त्रिपुर का विनाश
देवताओं की पुकार सुनकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने त्रिपुरासुर का वध करने का निश्चय किया। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। त्रिपुरासुर को हराने के लिए एक विशेष रथ, विशेष धनुष और बाण की आवश्यकता थी।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने एक विशाल रथ का निर्माण किया, जिसके पहिए सूर्य और चंद्रमा थे, सारथी भगवान ब्रह्मा बने, और धनुष स्वयं मेरु पर्वत था, जिसकी प्रत्यंचा (धनुष की डोरी) नागराज वासुकी बने। बाण के रूप में भगवान विष्णु और अग्नि देव संयुक्त हुए।
इस अद्भुत और शक्तिशाली रूप में भगवान शिव ने एक ही बाण से त्रिपुरासुर के तीनों शहरों, त्रिपुरों को एक साथ भस्म कर दिया। यह इतनी बड़ी विजय थी कि देवताओं ने स्वर्ग में खुशियाँ मनाईं। उन्होंने दीप जलाए, मिठाइयाँ बांटी और भगवान शिव की जय-जयकार की। यह जीत कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुई थी, और तभी से इस दिन को “देव दिवाली” के रूप में मनाया जाने लगा।
देव दिवाली का महत्व
देव दिवाली सिर्फ एक पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि यह हमें यह भी सिखाती है कि चाहे बुराई कितनी भी बड़ी क्यों न हो, सत्य और अच्छाई हमेशा जीतती है। इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व माना जाता है। लोग मंदिरों में दीपदान करते हैं, गंगा घाटों पर दीए जलाकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। वाराणसी की देव दिवाली तो जग प्रसिद्ध है, जहाँ गंगा के किनारे लाखों दीए जगमगा उठते हैं और ऐसा लगता है मानो स्वर्ग धरती पर उतर आया हो।
तो अगली बार जब आप देव दिवाली मनाएं, तो इस अद्भुत कथा को याद करें और बुराई पर अच्छाई की इस महान विजय का उत्सव मनाएं!

